बंगाल में ‘खेला’ पार्ट-2! क्या नंबर गेम हार रही हैं ममता बनर्जी? TMC में बगावत से हिली पार्टी की नींव
कोलकाता/नई दिल्ली | TechIC Khabar24
पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक बार फिर “खेला” शब्द चर्चा के केंद्र में है। लेकिन इस बार लड़ाई भाजपा और तृणमूल कांग्रेस (TMC) के बीच नहीं, बल्कि TMC के अंदर ही छिड़ती दिखाई दे रही है। पार्टी प्रमुख ममता बनर्जी के सामने सबसे बड़ी चुनौती अब विपक्ष नहीं बल्कि अपनी ही पार्टी के बागी सांसद और विधायक बन गए हैं।
हाल के दिनों में TMC के भीतर जिस तरह की बगावत सामने आई है, उसे पार्टी के इतिहास का सबसे बड़ा आंतरिक संकट माना जा रहा है। रिपोर्ट्स के अनुसार कई सांसद और विधायक पार्टी नेतृत्व से नाराज हैं और खुलकर विरोध कर रहे हैं।
आखिर शुरू कैसे हुआ विवाद?
2026 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के बाद TMC को बड़ा राजनीतिक झटका लगा। इसके बाद पार्टी के भीतर नेतृत्व और संगठन को लेकर असंतोष बढ़ने लगा। धीरे-धीरे यह नाराजगी खुले विरोध में बदल गई।
बताया जा रहा है कि बड़ी संख्या में विधायकों ने पार्टी लाइन से अलग रुख अपनाया और विधानसभा में अलग गुट बनाने की कोशिश शुरू कर दी। यही कारण है कि अब TMC को अपने ही नेताओं को एकजुट रखने के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है।
ममता बनर्जी को क्यों जाना पड़ा दिल्ली?
बढ़ती बगावत और सांसदों के संभावित टूट के बीच ममता बनर्जी अचानक दिल्ली पहुंचीं। उनके साथ पार्टी के कई वरिष्ठ नेता भी मौजूद रहे।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि दिल्ली दौरे का उद्देश्य केवल INDIA गठबंधन की बैठक में शामिल होना नहीं था, बल्कि असंतुष्ट सांसदों को मनाना और पार्टी में टूट को रोकना भी था।
क्या TMC के सांसद NDA में जाने की तैयारी में हैं?
सबसे बड़ा सवाल यही है।
कुछ रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि लगभग 20 सांसदों ने लोकसभा अध्यक्ष को अलग पहचान देने और NDA के साथ जाने की इच्छा जताई है। हालांकि इस पर अभी अंतिम आधिकारिक स्थिति स्पष्ट नहीं है।
यदि इतने सांसद वास्तव में अलग गुट बनाते हैं, तो यह ममता बनर्जी के लिए राष्ट्रीय राजनीति में बड़ा झटका साबित हो सकता है।
बागी सांसदों का क्या कहना है?
बागी नेताओं का आरोप है कि पार्टी में लोकतांत्रिक व्यवस्था कमजोर हो गई है और फैसले कुछ चुनिंदा लोगों तक सीमित हो गए हैं।
बागी सांसदों में शामिल कुछ नेताओं ने कानून-व्यवस्था, बेरोजगारी और संगठनात्मक फैसलों को लेकर भी सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा है कि वे अपने राजनीतिक भविष्य और जनता के हितों को ध्यान में रखकर फैसले ले रहे हैं।
अभिषेक बनर्जी भी निशाने पर?
राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि पार्टी के भीतर असंतोष का एक कारण नेतृत्व की दूसरी पंक्ति को लेकर भी है।
कई रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि कुछ सांसद संसदीय नेतृत्व में बदलाव चाहते हैं और इस मुद्दे पर भी अंदरखाने खींचतान चल रही है। हालांकि पार्टी नेतृत्व ने इन खबरों पर सार्वजनिक रूप से ज्यादा प्रतिक्रिया नहीं दी है।
क्या ममता बनर्जी नंबर गेम हार रही हैं?
यही वह सवाल है जो बंगाल की राजनीति में सबसे ज्यादा पूछा जा रहा है।
अगर बागी सांसदों और विधायकों के दावे सही साबित होते हैं तो TMC के लिए स्थिति बेहद चुनौतीपूर्ण हो सकती है। हालांकि ममता बनर्जी अभी भी पार्टी का सबसे बड़ा चेहरा हैं और उनके समर्थक दावा कर रहे हैं कि पार्टी जल्द ही इस संकट से उबर जाएगी।
BJP को कितना फायदा?
राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि यदि TMC में टूट गहराती है तो उसका सबसे बड़ा फायदा भाजपा को मिल सकता है। बंगाल में पहले ही राजनीतिक समीकरण बदल चुके हैं और ऐसे में TMC की आंतरिक कलह विपक्ष के लिए अवसर बन सकती है।
आगे क्या होगा?
फिलहाल सभी की नजर दिल्ली में चल रही राजनीतिक बैठकों और TMC नेतृत्व की अगली रणनीति पर है। आने वाले कुछ दिन यह तय कर सकते हैं कि ममता बनर्जी पार्टी को एकजुट रखने में सफल होती हैं या बंगाल की राजनीति में एक नया अध्याय शुरू होने वाला है।
निष्कर्ष
तृणमूल कांग्रेस अपने इतिहास के सबसे कठिन दौर से गुजरती दिखाई दे रही है। एक तरफ पार्टी के भीतर बगावत बढ़ रही है, तो दूसरी तरफ ममता बनर्जी अपनी राजनीतिक पकड़ मजबूत बनाए रखने की कोशिश कर रही हैं। अब सबकी नजर इस बात पर है कि क्या “दीदी” एक बार फिर राजनीतिक संकट से उबर पाएंगी या बंगाल में “खेला पार्ट-2” का परिणाम TMC के लिए भारी पड़ेगा।
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